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Shiv Puran: संपूर्ण शिवमहापुराण - अधाय 1 (परिचय और सहायक के साथ)

Sampurn Shiv Mahapuran: इस ब्लॉग पोस्ट में हम जानेंगे शिव महापुराण के प्रथम अध्याय के बारे में

/ Chaitanya Chaturvedi / 32 min read
Shiv Puran: संपूर्ण शिवमहापुराण - अधाय 1 (परिचय और सहायक के साथ)

शिवमहापुराण प्रथम अधाय सहायक

शिव पुराण एक हिंदू धार्मिक ग्रन्थ है, जो भगवान शिव के विभिन्न कल्याणकारी स्वरूपों, महिमा, लीला, उपासना, अवतार, ज्योतिर्लिंग, भक्त और भक्ति के बारे में विस्तार से बताता है। इस पुराण का सम्बन्ध शैव मत से है, जो शिव को सर्वोच्च परमेश्वर मानता है। इस पुराण को शिव का वाणी या वाङ्मय स्वरूप माना जाता है, जिसका पठन और श्रवण से मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है।

शिवमहापुराण का निर्माण इतिहास के अनुसर

शिव पुराण का निर्माण कब और कैसे हुआ, इसके बारे में विभिन्न मत हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह पुराण वैदिक काल में ही लिखा गया था, क्योंकि इसमें वेदों के अनेक उद्धरण मिलते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह पुराण बौद्ध काल में लिखा गया था, क्योंकि इसमें बौद्ध धर्म के खिलाफ आलोचना मिलती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह पुराण गुप्त काल में लिखा गया था, क्योंकि इसमें गुप्त साम्राज्य के शासकों का उल्लेख मिलता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह पुराण मध्यकालीन काल में लिखा गया था, क्योंकि इसमें इस्लाम धर्म के खिलाफ आलोचना मिलती है। इस प्रकार, शिव पुराण का निर्माण का कोई निश्चित काल नहीं बताया जा सकता है, लेकिन इसका अनुमान लगाया जा सकता है कि यह पुराण विभिन्न कालों में विभिन्न लेखकों द्वारा लिखा गया होगा, जिसके कारण इसमें विभिन्न शैलियों, विचारों और परम्पराओं का मिश्रण मिलता है।

शिवमहापुराण का निर्माण शिवमहापुराण के अनुसर

शिव पुराण का निर्माण भगवान शिव द्वारा स्वयं किया गया था, जब वे अपनी शक्ति पार्वती को शिव तत्त्व का उपदेश दे रहे थे। इस पुराण में शिव के विभिन्न स्वरूपों, महिमा, लीला, उपासना, अवतार, ज्योतिर्लिंग, भक्त और भक्ति के बारे में विस्तार से बताया गया है। शिव पुराण को शिव का वाणी या वाङ्मय स्वरूप माना जाता है, जो शिव के प्रति भक्ति का साधन है। शिव पुराण को भगवान शिव ने पहले अपने गणों को सुनाया, फिर उन्होंने इसे ब्रह्मा को सौंपा। ब्रह्मा ने इसे अपने पुत्र नारद को दिया, जो इसे वेदव्यास को दिया। वेदव्यास ने इसे अपने शिष्य सूत को दिया, जो इसे ऋषियों को दिया। इस प्रकार, शिव पुराण का ज्ञान गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से संकलित और संचारित हुआ।

क्या शिवमहापुराणा का कोई विभाजन भी है?

शिव पुराण का विभाजन विभिन्न संहिताओं में किया गया है, जो शिव के विभिन्न पहलुओं को प्रकाशित करती हैं। इन संहिताओं की संख्या भी विभिन्न संस्करणों में भिन्न-भिन्न है, लेकिन सामान्य रूप से इन्हें सात मुख्य संहिताओं में विभाजित किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं:

  • विद्येश्वर संहिता: इस संहिता में शिव के ज्ञान स्वरूप का वर्णन है, जिसमें शिव के विभिन्न नाम, रूप, गुण, लिंग, मंत्र, यंत्र, तंत्र, योग, ध्यान, आराधना, पूजा, व्रत, त्योहार, तीर्थ, स्तोत्र, कवच, आदि का विस्तृत विवरण है। इस संहिता में शिव के अनेक अवतारों की कथाएं भी मिलती हैं, जैसे वीरभद्र, भैरव, शरभ, गणेश, कार्तिकेय, आदि। इस संहिता में शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों का भी वर्णन है, जो शिव के द्वादश अद्भुत कर्मों के स्मरणार्थ स्थापित किए गए हैं।

  • रुद्र संहिता: इस संहिता में शिव के रुद्र स्वरूप का वर्णन है, जिसमें शिव के संहारक, उग्र, भयानक, अघोर, आदि रूपों का विवेचन है। इस संहिता में शिव के विवाह, पार्वती के जन्म, शिव-पार्वती के शास्त्रार्थ, शिव-पार्वती के विवाह, शिव-पार्वती के विवाह के बाद की घटनाएं, शिव-पार्वती के पुत्रों का जन्म, शिव-पार्वती के पुत्रों के विवाह, शिव-पार्वती के पुत्रों के कार्य, शिव-पार्वती के पुत्रों के भक्तों की कथाएं, शिव-पार्वती के पुत्रों के स्तुति, शिव-पार्वती के पुत्रों के उपदेश, आदि का वर्णन है। इस संहिता में शिव के अन्य अवतारों की कथाएं भी मिलती हैं, जैसे नंदी, वीरभद्र, भैरव, शरभ, गणेश, कार्तिकेय, आदि। इस संहिता में शिव के भक्तों की कथाएं भी मिलती हैं, जैसे रावण, बाणासुर, उपमन्यु, भृगु, दधीचि, मार्कण्डेय, शुक्र, दुर्वासा, विश्वामित्र, आदि। इस संहिता में शिव के भक्तों के लिए शिव के विभिन्न स्तोत्र, कवच, आरती, चालीसा, सहस्रनाम, आदि का भी वर्णन है।

  • शतरुध्र संहिता: इस संहिता में शिव के शतरुध्र स्वरूप का वर्णन है, जिसमें शिव के एक सौ रुद्र रूपों का विवेचन है। इन रुद्र रूपों में से प्रत्येक रुद्र का अपना नाम, रूप, गुण, शक्ति, वाहन, आयुध, भक्त, आदि है। इन रुद्र रूपों में से कुछ प्रसिद्ध हैं, जैसे महारुद्र, उग्ररुद्र, भवरुद्र, भीमरुद्र, अघोररुद्र, आदि। इन रुद्र रूपों के द्वारा शिव ने विभिन्न दुष्टों का संहार किया है, जैसे अंधकासुर, जलंधर, तारकासुर, शुम्भ-निशुम्भ, राक्तबीज, वृत्रासुर, आदि। इन रुद्र रूपों के द्वारा शिव ने विभिन्न देवताओं, ऋषियों, राजाओं, आदि की रक्षा भी की है, जैसे इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश, कार्तिकेय, नारद, व्यास, वाल्मीकि, श्रीराम, श्रीकृष्ण, आदि। इस संहिता में शिव के शतरुध्र स्वरूप की महिमा, उपासना, पूजा, व्रत, आदि का भी वर्णन है।

  • कोटिरुद्र संहिता: इस संहिता में शिव के कोटिरुद्र स्वरूप का वर्णन है, जिसमें शिव के एक कोटि रुद्र रूपों का विवेचन है। इन रुद्र रूपों में से प्रत्येक रुद्र का अपना नाम, रूप, गुण, शक्ति, वाहन, आयुध, भक्त, आदि है। इन रुद्र रूपों में से कुछ प्रसिद्ध हैं, जैसे नीलकण्ठ, चन्द्रशेखर, गङ्गाधर, विश्वनाथ, त्र्यम्बक, आदि। इन रुद्र रूपों के द्वारा शिव ने विभिन्न लोकों का सृष्टि, स्थिति, लय, आदि का कार्य किया है। इन रुद्र रूपों के द्वारा शिव ने विभिन्न भक्तों को वरदान भी दिए हैं, जैसे शिवजी, शिवानी, शिवदत्त, शिवकुमार, शिवप्रसाद, शिवशंकर, शिवराज, शिवलिंग, शिवभक्त, शिवचरण, शिवराम, शिवकृष्ण, शिवनारायण, शिवगोपाल, शिवगणेश, शिवकार्तिकेय, शिवनंद, शिवनारायण, शिवगोपाल, शिवगणेश, शिवकार्तिकेय, शिवनंद, आदि। इस संहिता में शिव के कोटिरुद्र स्वरूप की महिमा, उपासना, पूजा, व्रत, आदि का भी वर्णन है।

  • उमा संहिता: उमा संहिता भगवान शिव के अद्वितीय स्वरूप, मां पार्वती के साथ उनकी दिव्य लीलाओं, और भक्तों के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है। इसमें कई महत्वपूर्ण कथाएं शामिल हैं, जो भगवान शिव के भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में प्रेरित करती हैं। उमा संहिता में शिव-पार्वती के बीच होने वाले संवादों के माध्यम से भगवान की अनंत शक्ति और कृपा का वर्णन है। यह ग्रंथ भक्ति, तप, और ध्यान की महत्वपूर्णता पर बल देता है और भगवान शिव के नाम महिमा गान की अहमियत को बताता है। उमा संहिता में विभिन्न देवी-देवताओं के स्तुति और उनके लिए विधिवत् पूजा-अर्चना का वर्णन भी है। इसमें शिव-पार्वती के विविध रूपों की चरित्रकथाएं भी समाहित हैं जो भक्तों को दिव्य आत्मा की खोज में मार्गदर्शन करती हैं। साथ ही, उमा संहिता में भगवान शिव के पूजा-विधान, व्रत कथाएं, और उनके शिवलोक में स्थान का वर्णन भी मिलता है। इसमें भक्तों को उनकी भक्ति में समर्पित रहने के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है।

  • सहस्ररुद्र संहिता: इस संहिता में शिव के सहस्ररुद्र स्वरूप का वर्णन है, जिसमें शिव के एक हजार रुद्र रूपों का विवेचन है। इन रुद्र रूपों में से प्रत्येक रुद्र का अपना नाम, रूप, गुण, शक्ति, वाहन, आयुध, भक्त, आदि है। इन रुद्र रूपों में से कुछ प्रसिद्ध हैं, जैसे शिव, शंकर, महेश, महादेव, शम्भु, शशिशेखर, शूलपाणि, त्रिनेत्र, नीलकण्ठ, चन्द्रशेखर, गङ्गाधर, विश्वनाथ, त्र्यम्बक, आदि। इन रुद्र रूपों के द्वारा शिव ने विभिन्न लोकों का सृष्टि, स्थिति, लय, आदि का कार्य किया है। इन रुद्र रूपों के द्वारा शिव ने विभिन्न भक्तों को वरदान भी दिए हैं, जैसे शिवशर्मा, शिवदास, शिवप्रकाश, शिवभूषण, शिवरत्न, शिवमणि, शिवविजय, शिवसुख, शिवशांति, शिवप्रीति, शिवभक्ति, शिवज्ञान, शिवधर्म, शिवकर्म, शिवयोग, शिवध्यान, शिवसाधन, शिवसिद्धि, शिवमोक्ष, आदि। इस संहिता में शिव के सहस्ररुद्र स्वरूप की महिमा, उपासना, पूजा, व्रत, आदि का भी वर्णन है।

  • परमेश्वर संहिता: इस संहिता में शिव के परमेश्वर स्वरूप का वर्णन है, जिसमें शिव के सर्वोच्च, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वानन्द, सर्वसौन्दर्य, सर्वकल्याणकारी, सर्वप्रेमी, सर्वकारुणिक, सर्वदाता, सर्वरक्षक, सर्वनियामक, सर्वस्वामी, सर्वाधार, सर्वाधेय, सर्वात्मा, सर्वान्तर्यामी, सर्वरूपी, सर्वनामी, सर्वगुणी, सर्वलोकी, सर्वदेवी, सर्वशिवी, सर्वशाश्वती, सर्वशुद्धी, सर्वशान्ती, सर्वमङ्गली, सर्वपावनी, सर्वमायी, सर्वविधी, सर्वविधाता, सर्वविधिता, सर्वविधेयता, सर्वविधानता, सर्वविधारणता, सर्वविधारकता, सर्वविधारिता, सर्वविधारिणी, सर्वविधारित्री, सर्वविधारिष्णु, सर्वविधारिश्वर, सर्वविधारिपरमेश्वर, आदि रूपों का विवेचन है। इस संहिता में शिव के परमेश्वर स्वरूप की महिमा, उपासना, पूजा, व्रत, आदि का भी वर्णन है।

यह शिव पुराण के सात मुख्य संहिताओं का संक्षिप्त परिचय है, जो शिव के विभिन्न स्वरूपों, महिमा, लीला, उपासना, अवतार, ज्योतिर्लिंग, भक्त और भक्ति के बारे में विस्तार से बताती हैं। शिव पुराण का पठन और श्रवण से मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है।

शिवमहापुराण कलयुग तक कैसे पहुचा?

शिव पुराण को कलियुग तक पहुंचाने का श्रेय सूतजी को जाता है, जिनहाने इसे नैमिषारण्य में ऋषियों को सुनाया। नैमिषारण्य एक पवित्र वन था, जहां शौनकादि ऋषियों ने एक सहस्रवर्षीय यज्ञ का आयोजन किया था। इस यज्ञ के दौरान, वे शास्त्रीय ज्ञान के विषय में बातचीत करते थे। एक दिन, वे सूतजी को देखकर उनसे पूछते हैं कि उन्होंने कौन सा पुराण सुना है, जो सबसे श्रेष्ठ है। सूतजी उत्तर देते है कि उन्होंने शिव पुराण सुना है, जो सबसे श्रेष्ठ है। ऋषियों को शिव पुराण के बारे में जानने की उत्सुकता होती है, और वे सूतजी से इसे सुनाने का अनुरोध करते हैं। सूतजी उनकी इच्छा को स्वीकार करते है, और शिव पुराण का वर्णन करने लगते है। इस प्रकार, सूतजी ने शिव पुराण को नैमिषारण्य में ऋषियों को सुनाकर इसे कलियुग तक पहुंचाया। ऋषियों ने इसे अपने-अपने शिष्यों को दिया, और इसे आज तक संरक्षित रखा। शिव पुराण का पठन और श्रवण से मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है।

शिवमहापुराण शुरू कैसे होता है?

शिव पुराण के शुरु में शिव पुराण का माहात्म्य बताया गया है। इसमें बताया गया है कि शिव पुराण को भगवान शिव ने स्वयं अपनी शक्ति पार्वती को सुनाया, फिर उन्होंने इसे अपने गणों को सुनाया, फिर उन्होंने इसे ब्रह्मा को सौंपा। ब्रह्मा ने इसे अपने पुत्र नारद को दिया, जो इसे वेदव्यास को दिया। वेदव्यास ने इसे अपने शिष्य सूत को दिया, जो इसे नैमिषारण्य में ऋषियों को सुनाया। इस प्रकार, शिव पुराण का ज्ञान गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से संकलित और संचारित हुआ। इसमें चंचुला नामक एक पतिता स्त्री की कथा भी है, जो शिव पुराण सुनकर स्वयं सद्गति को प्राप्त हो जाती है, और अपने पति को भी मोक्ष दिला देती है।

शिवमहापुराण का अंत कैसे होता है?

शिव पुराण के अंत में शिव पुराण के फल का वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि शिव पुराण का पठन और श्रवण से मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है। इसमें शिव पुराण के विभिन्न अध्यायों के फल के बारे में भी बताया गया है, जैसे कि शिवरात्रि व्रत का फल, शिवलिंग की पूजा का फल, रुद्राक्ष का फल, भस्म का फल, दान का फल आदि। इसमें यह भी बताया गया है कि शिव पुराण को किस प्रकार से पढ़ना चाहिए, किस प्रकार के भोजन का त्याग करना चाहिए, किस प्रकार के व्रत का पालन करना चाहिए, और किस प्रकार के नियमों का अनुसरण करना चाहिए।

शिवमहापुराण के प्रथम अध्याय का सारांश और विशय

शिव पुराण के प्रथम अध्याय का सारांश इस प्रकार है:

  • इस अध्याय में शिव पुराण का माहात्म्य बताया गया है। इसमें बताया गया है कि शिव पुराण को भगवान शिव ने स्वयं अपनी शक्ति पार्वती को सुनाया, फिर उन्होंने इसे अपने गणों को सुनाया, फिर उन्होंने इसे ब्रह्मा को सौंपा। ब्रह्मा ने इसे अपने पुत्र नारद को दिया, जो इसे वेदव्यास को दिया। वेदव्यास ने इसे अपने शिष्य सूत को दिया, जो इसे नैमिषारण्य में ऋषियों को सुनाया। इस प्रकार, शिव पुराण का ज्ञान गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से संकलित और संचारित हुआ।
  • इस अध्याय में चंचुला नामक एक पतिता स्त्री की कथा भी है, जो शिव पुराण सुनकर स्वयं सद्गति को प्राप्त हो जाती है, और अपने पति को भी मोक्ष दिला देती है। इस कथा से यह बोध होता है कि शिव पुराण का पठन और श्रवण से मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है।

शिव पुराण के प्रथम अध्याय का विषय इस प्रकार है:

  • इस अध्याय का विषय है शिव पुराण का प्रारंभ, शिव पुराण का प्रवर्तक, शिव पुराण का प्रचारक, शिव पुराण का प्रयोजन, शिव पुराण का फल और शिव पुराण का महत्त्व।
  • इस अध्याय में यह बताया गया है कि शिव पुराण का प्रारंभ भगवान शिव से हुआ, जिन्होंने इसे अपनी शक्ति पार्वती को उपदेश दिया। शिव पुराण का प्रवर्तक ब्रह्मा हैं, जिन्होंने इसे अपने पुत्र नारद को दिया। शिव पुराण का प्रचारक वेदव्यास हैं, जिन्होंने इसे अपने शिष्य सूत को दिया। शिव पुराण का प्रयोजन है शिव भक्ति का विकास, शिव महिमा का प्रकाशन, शिव लीला का वर्णन, शिव उपासना का विधान, शिव व्रत का निर्देश, शिव ज्योतिर्लिंग का दर्शन, शिव भक्त का आशीर्वाद, शिव शक्ति का अभिन्नता, शिव गण का संगठन, शिव देव का संहार, शिव धाम का निर्माण और शिव तत्त्व का ज्ञान। शिव पुराण का फल है शिव प्रसन्नता, शिव कृपा, शिव वरदान, शिव सायुज्य, शिव आनन्द और शिव साक्षात्कार। शिव पुराण का महत्त्व है शिव पुराण सभी पुराणों में सर्वोत्कृष्ट, सर्वश्रेष्ठ, सर्वमंगलकारी, सर्वसिद्धिदायक, सर्वश्रेयस्कर और सर्वसाधनरूप है।

शिव महापुराण के प्रथम अध्याय की रूपरेखा

शिव पुराण के प्रथम अध्याय में सूतजी और शौनकजी के बीच एक संवाद है। सूतजी एक प्रसिद्ध कथावाचक थे, जो नैमिषारण्य में ऋषियों को पुराणों की कथाएं सुनाते थे। शौनकजी एक महान ऋषि थे, जो उनके श्रोताओं में से एक थे। इस एक्सरप्ट में, शौनकजी ने सूतजी से शिव पुराण के बारे में पूछा है, जो शिव की महिमा, भक्ति, उपासना और उनके लीलाओं का वर्णन करता है। शौनकजी ने यह भी पूछा है कि कलियुग में मनुष्यों को कैसे शिव की कृपा प्राप्त हो सकती है, और कौन सा साधन सबसे श्रेष्ठ और पवित्र है। सूतजी ने उन्हें बताया है कि शिव पुराण ही वह साधन है, जो शिव की प्रसन्नता, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और मुक्ति का कारण है। वे ने यह भी बताया है कि शिव पुराण का प्रवचन शिव ने ही किया था, और व्यासजी ने उसका संक्षिप्त रूप बनाया था। वे ने शौनकजी को शिव पुराण की महिमा, उसके सात संहिताओं, उसकी पूजा और पाठ की विधि, और उसके फल के बारे में बताया है।

शिव महापुराण के प्रथम अध्याय के आरंभ की जनकारी एवं प्रथम अध्याय के आरंभ की रूपरेखा

शिव महापुराण के प्रथम अध्याय के आरंभ की जनकारी एवं प्रथम अध्याय के आरंभ की रूपरेखा के बारे में जानने के लिए, हमें पुराणों की एक महत्वपूर्ण रचना, श्रीमद्भागवत पुराण की ओर देखना होगा। श्रीमद्भागवत पुराण भगवान विष्णु के दस अवतारों, उनके लीलाओं, उनकी भक्ति के उपायों और उनके भक्तों की कथाओं का वर्णन करता है।

इस पुराण का प्रवचन भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मित्र और सारथि अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्ध के पूर्व किया था। इस पुराण का संकलन वेदव्यास ने किया था, जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। वेदव्यास ने इस पुराण को अपने पुत्र शुकदेव को सुनाया था, जो एक महान ऋषि और ज्ञानी थे। शुकदेव ने इस पुराण को अपने शिष्य परीक्षित को सुनाया था, जो कुरुवंश के राजा थे। परीक्षित को एक साप के दंश से मृत्यु का श्राप मिला था, और उन्होंने अपने शेष जीवन को भगवान के नाम में बिताने का निर्णय किया था। उन्होंने शुकदेव को अपना गुरु बनाया, और उनसे भगवान के बारे में जानने की इच्छा जताई। शुकदेव ने उन्हें श्रीमद्भागवत पुराण की कथा सुनाई, जिससे उनका मन शांत हुआ, और उन्हें भगवान का दर्शन हुआ।

श्रीमद्भागवत पुराण की कथा को एक अन्य स्थान पर भी सुनाया गया था, जो नैमिषारण्य नामक एक पवित्र वन था। यहां पर एक बार एक बड़ा यज्ञ हुआ था, जिसमें बहुत से ऋषि और मुनि शामिल हुए थे। इस यज्ञ का नेतृत्व शौनकजी ने किया था, जो एक प्रसिद्ध ऋषि थे। शौनकजी ने अपने साथियों के साथ यज्ञ के अंतराल में धार्मिक विषयों पर चर्चा करने का निर्णय किया। उन्होंने एक विद्वान और कथावाचक को बुलाया, जिसका नाम सूतजी था। सूतजी वेदव्यास के शिष्य थे, और उन्हें पुराणों का गहन ज्ञान था। शौनकजी ने सूतजी से उनका स्वागत किया, और उनसे भगवान के बारे में जानने की इच्छा जताई। इस प्रकार सुत जी ने शिव महापुराण का आरंभ किया और इसे सुनाया और ऋषियों तक पहुचया।

सुत जी और शोनक जी का परिचय

सूत जी एक प्रसिद्ध कथावाचक थे, जिन्होंने महर्षि वेदव्यास के शिष्य होकर सभी १८ महापुराणों का अध्ययन किया था। उनका वास्तविक नाम रोमहर्षण था, क्योंकि उनका सत्संग पाकर श्रोताओं का रोम-रोम हर्ष से भर जाता था। उन्हें सूत जी इसलिए कहते थे, क्योंकि वे सूत समुदाय से थे। उनकी माता ब्राह्मणी और पिता क्षत्रिय थे, जिस कारण वे सूत के रूप में जन्मे। हालांकि, पुराणों की एक अन्य कथा के अनुसार, उनका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ था।1 शौनक जी एक महान ऋषि थे, जिन्होंने ऋग्वेद के अनेक सूक्तों की रचना की थी। वे ऋग्वेद के बहुदा संहिता के संपादक भी माने जाते हैं। वे अग्नि के उपासक थे, और उन्हें अग्निवेश्य भी कहा जाता है। वे महर्षि वेदव्यास के शिष्य थे, और उन्होंने उनसे वेदों और पुराणों का ज्ञान प्राप्त किया था। वे सूत जी के घनिष्ठ मित्र भी थे, और उन्होंने उनकी कथा को बहुत श्रद्धा और ध्यान से सुना था।

सूत जी और शौनक जी की आगे की पीढ़ी के बारे में पुराणों में अलग-अलग वर्णन मिलते हैं। एक वर्णन के अनुसार, सूत जी के पुत्र उग्रश्रवा थे, जिन्हें सौती भी कहा जाता है। वे भी अपने पिता की तरह महान कथावाचक थे, और उन्होंने महाभारत की कथा को वैशम्पायन ऋषि से सुनकर जनमेजय के सर्पयाग में सुनाया था। वे अपने पिता से भी अधिक शीघ्रता से समस्त पुराणों का अध्ययन कर लिए थे, और वे अपने पिता की भांति ही उस ज्ञान का प्रसार करने लगे थे।

शौनक जी के पुत्र का नाम शौनकी था, जो एक विद्वान और तपस्वी था। वे अपने पिता के अनुयायी थे, और उन्होंने भी अग्नि की उपासना की थी। वे अपने पिता के साथ ही नैमिषारण्य में रहते थे, और उन्होंने भी सूत जी की कथा को सुना था। वे अपने पिता की तरह वेदों और पुराणों के ज्ञाता थे, और उन्होंने भी उनका अध्ययन और अध्यापन किया था।

चलिये अब हम शिव पुराण के प्रथम अध्याय की और चलते हैं

शिवमहापुराण प्रथम अध्याय - (अध्याय -1)

शौनकजी ने पूछा - हे सूतजी, आप तो सभी शास्त्रों के रहस्य को जानते हैं। आप मुझे पुराणों की कहानियों का सार बताइए, जिनसे मुझे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अनुभव हो सके। ऐसा कौन सा उपाय है, जिससे मुझे विवेक का विकास हो और मैं अपने काम, क्रोध और अन्य दोषों को दूर कर सकूँ? इस कलियुग में तो लोग आसुरी प्रवृत्ति के हो गए हैं। उन्हें दैवी गुणों से सज्जित करने का कोई उपाय बताइए। आप मुझे ऐसा कोई साधन बताइए, जो सबसे श्रेष्ठ, मंगलमय और पवित्र हो। वह साधन ऐसा हो, जिससे मेरा मन शीघ्र ही शुद्ध हो जाए और मुझे शिव का दर्शन हो जाए।

सूतजी ने कहा - हे शौनक, आप भाग्यशाली हैं, क्योंकि आपके मन में पुराणों की कथा सुनने का बहुत उत्साह है। इसलिए मैं आपको एक ऐसा शास्त्र बताने जा रहा हूँ, जो सभी शास्त्रों का सार है, जो भक्ति को बढ़ाता है, जो शिव को प्रसन्न करता है। यह शास्त्र आपके कानों को अमृत की बूंदों से सिंचता है, यह शास्त्र दिव्य है, आप इसे ध्यान से सुनिए। हे मुनि, यह शास्त्र शिव पुराण है, जिसे भगवान शिव ने स्वयं बोला था। यह शास्त्र काल के दंश से बचाने वाला है। इस शास्त्र को वेदव्यास ने सनत्कुमार से सुनकर आदर के साथ संक्षिप्त में लिखा है। इस शास्त्र का लक्ष्य है - कलियुग में जन्म लेने वाले मनुष्यों का कल्याण करना।

यह शिव पुराण एक अद्भुत शास्त्र है। इसे इस संसार में शिव का वाणी माना जाता है और इसका पूजन करना चाहिए। इसका पाठ और श्रवण सभी के लिए उपयोगी है। इससे शिव भक्ति का अनुभव होता है और शिव का आशीर्वाद मिलता है। इसलिए मनुष्यों को इस पुराण को पढ़ने का शौक होना चाहिए - या तो इसको अपना जीवन का लक्ष्य बनाना चाहिए। इसी तरह इसका प्रेम से श्रवण भी सभी मनोरथों को पूरा करने वाला है। जो भगवान शिव के इस पुराण को सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और इस जीवन में भी उत्तम सुख पाकर अंत में शिव लोक में जाता है। यह शिव पुराण नामक ग्रन्थ एक अद्भुत और अनूठा रचना है, जिसमें चौबीस हजार श्लोकों का समावेश है। इस ग्रन्थ में शिव की महिमा, उनके विभिन्न रूप, उनके भक्तों की कथाएं, उनकी उपासना का विधान और उनसे प्राप्त होने वाले फलों का वर्णन है। इस ग्रन्थ की सात संहिताएं हैं, जो विद्वानों द्वारा विभिन्न विषयों पर विस्तृत जानकारी प्रदान करती हैं। इस ग्रन्थ का श्रवण या पाठ करने से मनुष्य को भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति होती है, जो उसे मुक्ति की ओर ले जाती है। इसलिए, मनुष्य को चाहिए कि वह इस ग्रन्थ को बड़े आदर और श्रद्धा के साथ सुने या पढ़े। यह ग्रन्थ परब्रह्म परमात्मा शिव का स्वरूप है, जो सभी भक्तों को उत्तम गति देता है। जो व्यक्ति निरंतर इस ग्रन्थ का अनुसरण करता है, वह पुण्यवान है, इसमें कोई संदेह नहीं है। जो बुद्धिमान व्यक्ति मरण के समय इस ग्रन्थ को भक्ति भाव से सुनता है, उस पर भगवान महेश्वर प्रसन्न होकर उसे अपना धाम देते हैं। जो व्यक्ति प्रतिदिन इस ग्रन्थ की पूजा करता है, वह इस संसार में सभी सुखों का अनुभव करके अंत में भगवान शिव के धाम को प्राप्त करता है। जो व्यक्ति प्रतिदिन इस ग्रन्थ को रेशमी वस्त्र आदि से सजाकर इसका सम्मान करता है, वह सदैव सुखी रहता है। यह शिव पुराण निर्मल और भगवान का सार है, जो इस लोक और परलोक में भी सुख देने वाला है। इसलिए, सभी को चाहिए कि वे इस ग्रन्थ का सेवन आदर और प्रयत्न के साथ करें। यह शिव पुराण धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार पुरुषार्थों का दाता है। इसका प्रेमपूर्वक श्रवण और विशेष पाठ करने से सभी कल्याण होता है।

जय शिव महापुराण। जय शिव शंकर।

Chaitanya Chaturvedi

Author

Chaitanya Chaturvedi

Founder and editor of NewsSanskriti, building a living digital home for Sanskriti, stories, Panchang, Jyotish and thoughtful audio essays.

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