एक दिन, विज्ञान की कक्षा में,
मैं बैठा था विषय से मुंह फेर कर,
दरीचे की ओर मुंह कर,
अपने है एक विषय पर मंथन कर रहा था,
बड़ी समस्या से गुज़र रहा था,
क्या ख़ुशी सदा बहार नहीं हो सकती?
क्या दुख जीवन से बाहर नहीं ही सकती?
क्यों आशाओं को हक़ीक़त कर बिना,
लोग मृत्यु को प्राप्त हो जाते?
सब कुछ रहते हुए भी, क्यों लोग बर्बाद ही जाते?
फिर याद आया कि,
न्युटन साहब के पहले गति के कानून ने यह कह दिया है कि,
स्थिर रहने वाले स्थिर ही रहेंगे और चलने वाले चलते ही रहेंगे,
जब तक कि कोई बाधा,
चलते हुए को रोक नदे,
यां रुके हुए को ठोक न दे ।
बात तो सच है, क्योंकि
हँसते हुए को हंसाया नहीं जा सकता,
जैसे रोते हुए को रुलाया नहीं जा सकता,
और यह भी मान लो की ख़ुशी है तो,
दुःख का आना भी निश्चित है,
क्योंकि न्यूटन साहब के तीसरे गति के कानून ने,
यह भी कह दिया है,
की हर कार्य के लिए
एक बराबर का विरूद्ध कार्य होता है,
इसलिए यह भी मान लो की संसार में सबकुछ छंडिक है,
और यह सत्य स्वीकार कर लो कि जन्म हुई है तो मृतयु भी निश्चित है।
स्वीकार करने वाले जीते जी अमर हो जाते हैं,
और अस्वीकार करने वाले दहल कर बर्बाद हो जाते हैं ।
तो आशाओं को हक़ीक़त में अगर तुम बदलना चाहते हो,
भिड़ से अलग अगर चलना चाहते हो,
कुछ बड़ा अगर करना चाहते हो, तो
मुश्किलों के लिए तैयार हो जाओ,
यह संभव है कि तुम्हे भय होगा,
पर उसपर विजय पायो,
और असंभव को संभव कर जाओ ।
संभव कर जाओ by Chaitanya Chaturvedi is licensed under Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International
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