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निर्गुण और निराकार ब्रह्म के लिए

सर्वोच्च वास्तविकता को समर्पित एक कविता

/ Chaitanya Chaturvedi / 1 min read
निर्गुण और निराकार ब्रह्म के लिए

एक कोने में था बैठा,

मैं झुकाए अपना सर,

राह पर थमकर,

समस्याओं और परिस्थियों से हारकर।


समझना मत मुझे देख कर सरल और शांत,

आंतरिक एक बहस में जूझता,

घुर्रराता, हंसता था मैं परेशान,

मंशा है मेरी हिलाना पूरा प्रांत।


ज्वाला हृदय की करती मुझे मजबूर,

कुछ लिखो वो कहती,

वो कहती करो इस घुटन को दूर ।


कलम जो उठाता होकर हर बार उत्सुक,

दुविधा और डर बदल देती मेरे विचारों का रुख।


लिखूं तो लिखूं पर विषय हो कौनसी, कोनसा अध्याय?

प्रश्नों से उभर कर में साझा किस पर करूं अपनी राय?


मीडिया के मुताबिक वो खूनी है फरार,

पुलिस है पीछे,

मानो इसी समस्या में फसा पूरा संसार,

खबर है जरूरी तो बने रहिए लगातार,

मिलते है हम आपसे विज्ञापन के उस पार,

घंटो के विज्ञापन में मैं भूल गया समाचार ।


नोटिफिकेशन पर देख कर वही नंबर हर बार,

समझ जाता मैं, अब इसकी कहानी में होगा मेरा समय बेकार,

संकट बिचारे की मानो ऐसा पहाड़,

मुसीबत में सारे, उसे छोड़ जाते हर बार,

दुखड़ा वही दर्द, वही समस्या, वही लड़की, वही प्यार,

कहता वो अंत में भाई करदे बीस का रिचार्ज ।


कुछ दिन जो बीत ते चैन के एक बार

की फिर आता मेरे जीवन में वही समस्याओं का त्योहार।


हर सुबह की चाय के बाद पापा का वही राग,

ढूंढो जल्दी नौकरी, सारा जीवन नही खिलाएगा तुम्हारा बाप ।


जोश से भरकर जो मैं फॉर्म भरता हर बार,

वी रिग्रेट टू इनफॉर्म का ईमेल मिलता हर बार ।


समस्याएं है बेशक अनगिनत अपरंपार,

विषय हो कौनसी, किस अध्याय पर छेडूं अपने तार?


मौन के बीच, मेरे हृदय से उठा एक स्वर,

इस कविता को समस्या पर अर्पित न कर,


जिस अवस्था, जिस चेतना में बैठा तो इस कदर

इस कविता को दे तू अपना एक स्वर

और उन सबको तू आज अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर ।


तो बेशक मैं अपने माता और पिता को यह समर्पित करूंगा,

उन्ही के समर्पण को कृतज्ञता व्यक्त करूंगा ।


पर भाई जो मेरे मुझसे है बड़े,

उन्हे कैसे भूलूं वो मेरी हर समस्या में थे खड़े ।


फिर दोस्त निकम्मा भले रिचार्ज था करवाता

वही एक था जो मेरी खूबियों को सराहता ।


फिर पड़ोसी जो मेरे मुझसे लड़पड़े

उनको कैसे भूलूं, उनकी प्रतर्णा ने मेरे कामयाबी के नीव भरे ।


फिर प्रधानाचार्य, अध्यापक, गुरु और उपदेशक,

इनकी भी भूमिका रहीं है बेशक ।


वो पथ राही, वो अजनबी, वो मतवाले, वो सरफिरे,

सब ने मेरे जीवन में बराबर रोशनी बिखेरे,


अंततः भगवान को प्रणाम में करूंगा,

मिले तो नही कभी इसलिए केवल यह कहूंगा,


यह कविता है समर्पित एक नाम और धर्म के लिए,

निर्गुण और निराकार ब्रह्म के लिए,

निर्गुण और निराकार ब्रह्म के लिए।

Chaitanya Chaturvedi

Author

Chaitanya Chaturvedi

Founder and editor of NewsSanskriti, building a living digital home for Sanskriti, stories, Panchang, Jyotish and thoughtful audio essays.

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