नदियों से मैं होकर ओझल,
आसमान में मिलजाता हूं,
निराकार मैं रहकर एक पल,
फिर इन नदियों में ही खोजता हूं ।
वायुमंडल के सैर लगाता,
नदी, नहर में बहता जाता,
फिर मेघों से मैं पड़कर बारिश,
एक बूंद तभी मैं कहलाता ।
सालों से मैं यहां रहा,
पर भावनाओं से वांछित हूं,
मुझसे होकर बने लहर,
पर मैं सदा ही बंद नाम से अंकित हूं ।
मुझको भी है समय को जीना,
भावनाओं से अंकित होना,
मुझको भी एक आकार का रहना,
अब नदियों में नही मुझको बहना ।
मुझसे होकर ही बहती नदियां
कई नदियों की मैं पथदर्शक हूं,
सदा ही मैंने कल्याण किया,
क्योंकि धरती मैं ही कहलाती हूं ।
तुम जो सदा ही फिरते हो,
फिर इन नदियों में गिरते हो,
मुझमें आकार तुम पड़ जाओ,
एक तोहफा तुम भी ले जाओ,
भावनाओं से युक्त हो जाओ,
एक आकार तुम भी अब पाओ,
जीवन का जो गठबंधन है,
इसमें तुम भी अब बांध जाओ,
तोहफा एक मुझसे तुम लेकर,
जीवन अब तुम भी पा जाओ ।
बूंद by Chaitanya Chaturvedi is licensed under Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International
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