अजीब है । मैने कुछ लिखा था और मुझे उस पर किसी की राय चाहिए थी । मेरे साथ यही समस्या रहती है, मुझे हर दो कदम पर पूछना पड़ता है "भाई साहब क्या यह रास्ता वहीं ले जाती है, जहां मैं जाना चाहता हूं?" । मैने सलाह और परामर्श हेतु अपनी लेखनी को "रेडिट" जो की एक सोशल प्लेटफार्म है, उस पर डाला । मैं बता दूं की मैने उसे अंग्रेजी में लिखा था ।
रेडिट पर कुछ चुनिंदा फोरम थे जिन पर मैने अपनी उस लेखनी को डाला । मैं उम्मीद कर रहा था कुछ सत्य से भरे आलोचना की, हालाकि मैं कह तो रहा था की मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता वो इसे अच्छा या बुरा कहें, पर शायद, शायद अंदर ही अंदर प्रशंशा की उम्मीद भी कर रहा था, पता नहीं । एक गुमनाम व्यक्ति ने एक करारा जवाब लिखा, उसने कहा "सच बताऊं तो किसी के पास इतना व्यर्थ का समय नहीं है की वो तुम्हारी यह लेखनी पड़े, पहले वाक्य से यह ध्यान नहीं आकर्षित करती है, और इसे पढ़ने पर व्यथित होता है की यह किसी सरफिरे का अपने डायरी में लिखी भड़ास है" एक दूसरे व्यक्ति ने लगभग ऐसा ही कहा, उसका भी यही मानना था की यह किसी के डायरी में लिखी भड़ास है ।
यह सब पढ़के मुझे बहुत हंसी आ रही थी । मैने गौर किया की कैसे लोग चीजों को समझ ने की कोशिश करते हैं। मतलब हमने सब कुछ के लिए शब्द बना रखा है । हंसी, खुशी, दुख, दर्द, आदि अनेक और अनगिनत शब्द हैं । मुझे लगता है की यह सारे शब्द एक प्रयास होते हैं, अपने सोच को पूर्ण विराम लगाने की एक कोशिश होते हैं । मुझे नहीं पता दूसरों को क्या लगता है और वो क्या सोचते हैं, पर मुझे यह बहुत अजीब लगता है । हां, ना, जन्म, मृत्यु, डिप्रेशन, एंजाइटी, आदि, सारे के सारे शब्दों को जान के लगता है मानो जैसे किसी ने कुछ समझने का प्रयास किया है, किसी ने अपनी दुविधा को दूर करने का प्रयास किया है ।
पर मुझे नही लगता की यह प्रयास सफल है, क्योंकि मैं तो फिर भी हर जगह दुविधा देखता हूं । यूं समझिए, जब मैं कॉफी शॉप पर जाता हूं, और वो मुझ से पूछते है "सर हॉट कॉफी या कोल्ड कॉफी?" तो मुझे बहोत अजीब लगता है, मतलब एक तरफ हॉट कॉफी वो इतना गरम देते हैं की होंठ जलता है, पकड़ने में भी तकलीफ होती है, और पीने में समय भी लगता है । दूसरी तरफ कोल्ड कॉफी फीकी और बेकार लगती है, बहुत जल्दी खत्म हो जाती है मुझसे और मैं न तो ठीक से उसका मजा ले पता हू न ही संतुष्ट होता हूं । मुझे जैसी काफी चाहिए हॉट और कोल्ड के बीच की वो वह रखते नहीं हैं । और यह बस कॉफी की बात नहीं है, मतलब "डबल एक्सएल" के कपड़े ज्यादा बड़े होजते हैं और "एक्सएल" के बहुत छोटे ।
मैं उम्मीद कर रहा हूं की आप मेरी बात समझ रहे होंगे । एक तरफ जहां कोई मेरी लेखनी को डेयरी में लिखी बकवास बोल रहा था वहीं किसी ने कहा की वो चौंक गए उसे पढ़के, किसी ने कहा की उनके लिए यह एक दिल को छू जाने वाली लेखनी थी, और पता नही क्या क्या । सब अपने अपने हिसाब से चीजों को समझने की कोशिश कर रहे हैं, प्रयास कर रहे हैं। सब पूर्ण विराम लगाना चाहते हैं, सब चाहते हैं की वो कुछ ऐसा कह दे जिससे उस पर बहस बंद हो जाए । और सबको लगता है को वो सही हैं ।
अजीब लगता है । मुझे नास्तिक मत समझिएगा, पर मैं सच बता दूं की मुझे इन सब कुछ में इतना भी यकीन नहीं होता है । मतलब मैं बेशक पूजा पाठ करता हूं, हांत जोड़ता हूं, आरती दिखाता हूं, पर मेरे अंदर से वो भाव नहीं आता है, मुझे नही पता अगर भगवान प्रकट होंगे तो भी मैं यकीन करूंगा या नहीं । शायद मैने कभी भगवान को इन सब रूप में माना ही नही है । मुझे नही पता, मैं नहीं जानता । पर यह दुनिया भर की दुविधा मुझे बार बार किसी ओर ढकेलती है । मुझे लगता है की दुनिया के सारे जवाब, सारे सवाल, सब कुछ एक दुविधा है, एक चुनाव है । मैं झूठ नही बोल रहा, हर उत्तर हर प्रश्न से ऐसा प्रतीत होता है की हमें मजबूर किया जाता है की हम कुछ चीजों के बीच चुनाव करें ।
लगता है जैसे हमें बाधित किया जाता की हम जल्दी से एक मुखौटा ओढ़ कर किसी एक भीड़ में शामिल होजाएं और नारा लगाएं की हमें तो यही सही लगता है । मुझे अपनी भावनाओं और तकलीफ को बताने में बहुत कष्ट होता है, मतलब हां बेशक मुझे जुकाम होता है, मुझे भूख लगती है, मुझे भोजन स्वादिष्ट लगता है, मुझे डिप्रेशन भी होता है पर जब मैं कहता हूं की मुझे जुकाम है तो वह समझते कुछ है और दवा कुछ लिखते है, मैं जब कहता हूं की खाना अच्छा बना तो भी ऐसा ही होता है और उसी तरह जब कहता हूं भोजन स्वादिष्ट था तो भी यही होता है । मुझे नहीं लगता आप मेरी बात समझे होंगे । पता नहीं ।
मुझे लगता है की हम दुविधा को दूर करने के लिए इतने परेशान हो गए थे, की हमने जो हमारे भगवान के विचारों को नहीं मानते उनको भी एक उपाधि दिया और जो भगवान को ही नहीं मानते उनके लिए भी एक उपाधि दिया । हमने सबको एक उपाधि दिया है ।
पर मैंने ऐसा महसूस किया की चाहें मैं भगवान को शिव मानू या ब्रह्मा या विष्णु या शक्ति, चाहें मैं उन्हें मानू भी या ना मानू । पर मैं भावनाओं की अस्तित्वता को नहीं न कर सकता, मैं नहीं नकार सकता उस निराशा को जो हमें तब होती है जब चीजें हमारे मन के मुताबिक नहीं होती । मैं नहीं नकार सकता उस विसंगति यां नियमहिंता को जो उसे भी हमारे बराबर के स्थान पे ला के रख देती है जिसके आने का हमें कभी उम्मीद भी नही होता । मैं नहीं नकार सकता उस आशा के किरण को जो एक नास्तिक के मन में भी उम्मीद जगा देती है । मैं नहीं नकार सकता उस कारण, उस प्रश्न, उस उत्तर, उस तर्क को जो हमें अंधविश्वास पर विश्वास करने के लिए मजबूर करती है ।
मुझे लगता है कि वो कुछ ऐसा है जो हमे हिम्मत, साहस और विश्वास देता है, वो कुछ ऐसा है जो चाहता है की हम विश्वास रखें, सबकुछ पर यकीन रखे पर साथ ही साथ सब कुछ को लेके मन में सावधान भी रहें । मैने किसी सत्य को नहीं जाना, मैं कुछ से भी अवगत नही हूं, मुझे बस ऐसा लगता है । मुझे लगता है की यह सब कुछ हमें संतुलन की ओर ढकेलता है । मैं चाहता हूं के मैं अपने अनुभव को आपके साथ साझा करूं पर मुझसे नहीं हो पाता है, मेरे लिए यह ऐसा होता है मानो की आपकी नींद खुली और आप अपने आपको एक ट्रेन में पाते हैं, वो ट्रेन हर कुछ घंटो में किसी स्टेशन पर रुकती है पर आप को समझ नहीं आता की ये वही जगह है जहां आपको जाना है और आप बस चलते चले जाते है उस ट्रेन के सफर में, बस चलते चले जाते हैं।
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