न जाने मैं कौनसी दुविधा में पल रहा हूं,
अनजाने इस जीवन के किस राह पर चल रहा हूं ।
हर बार जो होती कुछ लोगो से मुलाकात,
मिलकर उनसे लगता शायद अब बनेगी बात,
फिर मुश्किल से कुछ दूर जो चलते हम साथ,
की प्रताड़ना और बहस में खतम होती हमारी बात ।
फिर हृदय में वही दर्द लिए दर दर फिरता हूं,
मंदिर मंदिर घूमकर भगवान के पांव गिरता हूं ।
फिर कुछ दिन जो बीत ते, भरते मेरे घाव,
की फिर एक प्रश्न ले आती एक नया चुनाव ।
फिर मुखौटा मैं ओढ़कर एक भीड़ से जो सहमति करता हूं,
की अंततः फिर भगवान के ही पांव गिरता हूं ।
अब मुझसे कोई पूछे जीवन का रहस्य,
तो मेरे लिए वह होगा निराकार एक सत्य ।
अनुभूति वो है एक रेल गाड़ी के सफर जैसे,
जहां यात्री स्वयं से संदेह में प्रश्न पूछे,
आखिर इस रेल गाड़ी में वह पहुंचे कैसे?
फिर हर थोड़ी थोड़ी देर पर स्टेशन जो आता है,
उतरूं या न उतरूं, दुविधा यही लाता है,
अनजाने इस सफर में पता नही कब मंजिल का आना है,
धैर्य से बैठकर,
बस चलते चले जाना है,
बस चलते चले जाना है ।
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